March 07, 2012

An ideal Indian woman - ek Adarsh Bhartiya Nari



This post has originally been my comment on Indian Home Maker (IHM)'s blog. Her post was in reply to some sexist poem shared in an anti-muslim and anti-congress page on Facebook called Thalua club. The Facebook fan page appears as stupid as the name. Anyway, on IHM's request, I'm re-posting my comments there on her blog post as a separate post here. You can see the original poem as well as IHM's reply to it through the above links. On IHM's post, you can also see the English translation of the poem.


Here, the lines of the original poem are in slightly grey colour while my replies are in black. Please don't mind grammatical errors in Hindi as it's not my area of strength.


Ideal Indian woman (??)
सर पे सिंदूर का “फैशन” नहीं है,
सिन्दूर करने या नही करने से क्या फरक पडेगा… मुझे बताओ…
गले मे मंगलसूत्र का “टेंशन” नहीं है !
आदमी ने तो मंगलसुत्र कभी पह्ना ही नही हैं तो क्या आदमी कभी आदर्श था ही नही और हैं भी नही?
माथे पे बिंदी लगाना “आउटडेटेड” लगती है,
जिस आदमी को लगता हैं कि बिन्दी लगाना “कुल” हैं वोह खूद अपने सर पे बिन्दी लगा सकता हैं ना?
तरह तरह की लिपस्टिक अब होंठो पे सजती है !
लड़कियो/औरतो को खुद बिन्दी लगाना अगर अच्छा लगता हैं और जहाँ तक मेरा खयाल हैं तब तक लगभग सभी आदमियोंको भी ये अच्छा लगेगा कि उसकी बीवी या girlfriend लिपस्टिक लगाए. अगर तुम्हे खुद लिपस्टिक लगाना पसंद नही हैं तो तुम मत लगाओं… कभी कोइ लड़कीने ने तो कोइ कविता नही लिखी कि jeans आदमी पे सजता हैं या नही सजता हैं.
आँखों में काजल और मस्कारा लगाती हैं,
आँखों में काजल और मस्कारा तो छोटे बच्चे कोइ भी लगाते हैं. क्या वो सुन्दर नही लगते? और लड्की लगाए तो वोह आदर्श नही हैं… क्या बात हैं भाई… आदर्शत की आपकी व्याख्या भी क्या खुब हैं! लड़कियोको सुन्दर दिखने के लिए आन्खोंमे क्या लगाना चाहिए वोह भी आप ही बताओगे क्या? कभी कोइ लड्की या औरतने आपको ऐसा कहा की आप आँख पे चश्मा लगाओं या फिर गोगल्स लगाओं या ना लगाओं?
नकली पलकों से आँखो को खूब सजाती हैं !
उसकी पलके नकली हैं तो तुम अपने असली शरीर पे गर्व करो. और अच्छे कपड़े जो सचमे आपकी व्याख्या मे नकली चीज होनी चाहिए उसको छोडके फटे पूराने “असली” कपड़े पहेना करो.
मूख ऐसा रंग लेती हैं की दूर से चमकता है,
तो उससे आपके चेहरे की रोनक को तो कोइ नुक्सान नही हैं ना? आप बस इतना ख्याल रखो की रोज नहाओ और नाक और चेहरा ठीक से साफ किया करो… दुनिया पे बडा उपकार रहेगा.
पर्फ्यूम इतना तेज की मीलों से महकता है !
तो आपको क्या किसी का बास मारता शरीर ज्यादा आकर्षक लगता हैं? पर्फ्यूम कितना तेज होना चाहिए वोह भी आप ही बताओगे क्या?
जो नथ कभी नाक की शोभा बढाती थी,
आपको अभी भी लगता हैं क़ि नथ नाक की शोभा बढाती हैं तो आप उसे क्युं नही पहेनते?
आज होठ और जीभ पे लग नाक
ओके! आपको सिर्फ नाक मे गहना “कूल” लगता हैं… होठ और जीभ पे नही… आपको पसंद नही हैं तो मत लगाओं… आप औरो को या अपने आसपास क़ि औरतो को क्या लगाना चाहिए ये क्यु बताते हो?
बालों की “स्टाइल” जाने कैसी -
कैसी हो गयी,
वो बलखाती लंबी चोटी ना जाने
कहाँ खो गयी !
आप सर टकला रखते हो क्या? नही ना? आप अपनी हैर स्टाइल भी खुद ही चुने और दुसरोकी भी… आप अपनी बाल खुद की पसंद की हुइ “स्टाइल” मे रखना हैं और दुसरो की चोइस पर भी अंकुश करना हैं?
और परिधान तो ऐसे “डिज़ाइन” में आये हैं,
आप धोती-कुर्ता पहेनते हो क्या? आप खुद्के लिए खुदको अच्छा और आकर्षक दिखाने वाले कपड़े पहेनते हो ना?
कम से कम पहनना इन्हें खूब भाये है !
आप अपना सर, हाथ, पैर और पुरा शरीर ढक जाए ऐसे कपड़े पहेनते हो?
आज अंग प्रदर्शन
करना मजबूरी सी लगती है,
इसको पसंद बोलते हैं, मजबूरी नही. लड़के अपनी छाती और कसरत कीये हुए हाथ दिखाएं तो आपको ऐतराज़ नही होगा… सही ना? हाँ… लड़कियों को ऐसा नही करना चाहिए… लड़को के लिए सब सही हैं… ऐसा ना?
सोचती है इसी मे
इनकी खूबसूरती झलकती है !
आपके आसपास वाले ९९ प्रतिशत लड़के भी शायद यही सोचते हैं… कभी उससे पुछ्के देखिए…
पर आज भी जब कोई भारतीय परिधान
पहनती है,
सच बताऊं सभी की आँखे उस पे ही अटकत हैं !
मतलब आप लड़कियो को और औरतो को घूरते हैं? एक आदर्श पुरुष के नाते आपको उसपे आंखें अटकानी ही चाहिए… एक लड्की को सजने का हक नही हैं पर हर आदमी को उसपे आंखें अटकाने का हक हैं… कभी अपने आसपासकी लड़कियों से पुछा की आप जैसे पुरुषोकी नजर उसपे अटकती हैं तो उसे कैसा लगता हैं?
सादगी, भोलापन और शर्म ही भारतीय स्त्री की पहचान है,
और भारतीय पुरुषो की क्या पहचान हैं? आप भारतीय पुरुषो की पहचान सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं?
मत त्यागो इन्हें यही हमारे देश का स्वाभिमान है !
हाँ! देश का स्वाभिमान लड़कियों को अंकुश मे रख्ने से और उसको बडे कपड़े पह्नाने मे ही हैं!
यदि अब भी हम सोच रहे है कि ये आने
वाली माताएं हमारी आने वाली पीढ़ी में
‘भगत सिंह या नेताजी’ पैदा करेंगी, तो हम
गलत सोच रहे हैं,
आप तो ज्योतिष भी लग रहे हो…
पश्चिम की नक़ल करते
करते हम पूरी तरह अंधे हो चुके है……
जरा अपनी कमरसे नीचे देखिए… आपने धोती नही पहेनी हैं… जो पहेना हैं वोह भी पश्चिम की नक़ल ही हैं…
जो अब लाइलाज बीमारी का रूप ले चुकी है……!!
बिमार तो वो पुरुष लगते हैं जो लड़कियो को संस्कृति के नाम पे अंकुश करने मे लगे हैं…
॥ ईश्वर इन्हे सद्बुद्धि दे ॥
और ये कविता लिखने वाले को भी!
जय हिन्द, जय भारत !!
आपने खुद देश के लिए क्या किया हैं? जय हिन्द, जय भारत बोलनेसे ही हम आदर्श हो जाते हैं क्या?




I don't know who wrote the original poem. It doesn't matter. The poem has got many Facebook 'like's too. I believe it would take decades, if not centuries, that such people become a minority among general male population.

7 comments:

  1. Good post written on the eve of International Women's Day... For such poem, FB should introduce 'Dislike' link...!

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  2. Very interesting buddy...I really enjoyed reading your replies..:D

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  3. @Aswani,

    Thanks for the words :-)

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  4. Here is an interesting poem posted by someone on IHM's blog in reply to the above poem:

    http://indianhomemaker.wordpress.com/2012/03/06/adarsh-bhartiya-nari-ideal-indian-woman/#comment-115056

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  5. The presence of men like you makes us women feel safe and sound.
    One of the best post I have read in recent times.
    Following you.

    Do have a quick peek on my blog if you get chance.
    http://mycactusdress.blogspot.com/
    Dhara

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  6. Unrelated to the post... here is something from NYT that might interest you:

    A study called “Egalitarianism, Housework and Sexual Frequency in Marriage,” which appeared in The American Sociological Review last year, surprised many, precisely because it went against the logical assumption that as marriages improve by becoming more equal, the sex in these marriages will improve, too. Instead, it found that when men did certain kinds of chores around the house, couples had less sex. Specifically, if men did all of what the researchers characterized as feminine chores like folding laundry, cooking or vacuuming — the kinds of things many women say they want their husbands to do — then couples had sex 1.5 fewer times per month than those with husbands who did what were considered masculine chores, like taking out the trash or fixing the car. It wasn’t just the frequency that was affected, either — at least for the wives. The more traditional the division of labor, meaning the greater the husband’s share of masculine chores compared with feminine ones, the greater his wife’s reported sexual satisfaction.

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  7. @H2,

    So, what do you and the study intend to say?

    Even if we choose to believe a random single report to be true, wouldn't a sane, normal person choose equality over a little increase in sexual satisfaction?

    What will you do if you were a woman? (I assume you are a male)

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